Outdated Science, Fake Acharya & Global Confusion: आर्य प्रशांत का 17वीं सदी वाला ‘ज्ञान’

📌 आर्य प्रशांत और उनकी कालबाह्य ‘साइंटिफिक’ समझ

अगर आप भी सोचते हैं कि “T = 2π √(L/g)” का फॉर्मूला आज भी हर सवाल का उत्तर है, तो जनाब आप भी आर्य प्रशांत विश्वविद्यालय से पीएचडी ले चुके हैं!

जिस युग में क्वांटम मैकेनिक्स, न्यूरोसाइंस और कॉस्मोलॉजी की दुनिया नए आयाम छू रही है, वहाँ एक स्व-घोषित “आचार्य” आज भी क्रिश्चियन ह्यूजन्स के pendulum formula को लेकर ज्ञान बाँट रहे हैं, मानो विज्ञान वही है जो न्यूटन और थॉमस हॉब्स ने कभी सोचा था।

👉 “बिलकुल वही साइंस, जो आर्य प्रशांत की डिक्शनरी में अंतिम सत्य है।”

क्लासिक अद्वैत वेदांत: “सही और गलत का भेद मिटा दो”
गपोड़ी लाल अद्वैत वेदांत: “गलत को ही सही मान लो, बस आत्मविश्वास 200% रखो!”

🚨 BITS Goa, You Invited This Guy?

देश के सबसे प्रतिभाशाली छात्रों को जिनकी सोच आसमान छू सकती है, उन्हें बुलाकर “आत्मा कुछ नहीं होती, बॉडी डेड तो डेड” जैसा रट्टा पढ़ाया जा रहा है?
BITS Goa, ये बॉडी-विथआउट-सोल-थ्योरी कौन से रिसर्च पेपर पर आधारित है?

🌆 और दुबई…?

दुबई वालों से बस इतना ही सवाल है:
“Science के नाम पर ज़रा तो देख लेते कि आप किसे स्टेज दे रहे हैं?”
आर्य प्रशांत को रेड कारपेट? क्या इसलिए कि उन्होंने विज्ञान को 17वीं सदी में फ्रीज़ कर दिया है?

📽️ इस पूरे ढोंग, बौद्धिक चालाकी और पुराने वैज्ञानिक कचरे की एक्सपोजिंग देखने के लिए मेरा ये वीडियो ज़रूर देखें:

🧪 भाग 1: “T = 2π √(L/g)” और 17वीं सदी के गुरुजी

आर्य प्रशांत बार-बार कहते हैं:

“विज्ञान का परिणाम सबके लिए समान होता है।”

और फिर उदहारण देते हैं —
T = 2π √(L/g)

“देखिए जी, पेंडुलम का टाइम पीरियड सबके लिए सेम आएगा! यही है साइंटिफिक सत्य!”

वाह!
क्या बात है!
गपोड़ी लाल का Nobel-ready formula!

भाई, Newton का युग 400 साल पहले का था, और आप उसे आज Vedanta के खिलाफ मिसाइल की तरह चला रहे हो?

क्या आपको नहीं पता:

  • Quantum Physics में observation से result बदलता है?
  • एक ही experiment में दो scientists अलग-अलग निष्कर्ष निकाल सकते हैं?
  • Data interpretation भी observer के माइंडसेट पर निर्भर करता है?

फिर भी आर्य प्रशांत साहब ये दावा कर बैठते हैं कि “विज्ञान observer-independent है” — क्योंकि शायद उन्हें आज तक Quantum Mechanics और Observer Effect का पता नहीं!

क्वांटम भौतिकी में observer effect यह सिद्ध करता है कि किसी घटना का परिणाम उस पर नज़र रखने वाले की उपस्थिति से प्रभावित होता है। अब चौंकाने वाली बात ये है कि अलग-अलग experimenters अलग-अलग तरीके से measurement करते हैं — जैसे उनके उपकरणों का चयन, उनके observation का समय, उनका reference frame, और यहाँ तक कि उनकी सोचने की शैली भी। इसका मतलब यह है कि एक ही क्वांटम प्रणाली को दो experimenters अलग-अलग प्रकार से देख सकते हैं, और इसलिए उनके observation से निकला परिणाम भी भिन्न हो सकता है। इसीलिए आज की cutting-edge physics में कहा जाता है कि observation पूर्णतः “observer-independent” नहीं है। यही कारण है कि आर्य प्रशांत का ये दावा कि “science सबके लिए same result देता है,” 17वीं सदी की oversimplified thinking है, न कि 21वीं सदी की science!

वैसे जिन्हे सत्रहवीं शताब्दी के विज्ञान से मोह हो वो आधुनिक विज्ञान सीखे भी क्यों?

🕰️ Christian Huygens: जिनका formula आर्यजी ने ब्रह्मवाक्य बना दिया

जिस T = 2π √(L/g) formula का इस्तेमाल आर्यजी वेदों को outdated बताने में करते हैं,
वो बना था Christian Huygens द्वारा — सन 1673 में।

Christian Huygens वही व्यक्ति थे जिन्होंने:

  • Pendulum clocks को precise बनाया
  • Light के wave theory का foundation दिया
  • और हाँ, calculus के महान प्रयोगकर्ता Leibniz को एक गणितीय puzzle भी हल करने को दिया:
    “Inverse Triangular Number Summation”
Sum of inverted triangular numbers as solved by Leibniz

इस प्रश्न को लाइब्निज़ साहब ने ऐसे हल किया –

Sum of inverted triangular numbers as solved by Leibniz
Sum of inverted triangular numbers as solved by Leibniz
Sum of inverted triangular numbers as solved by Leibniz
Sum of inverted triangular numbers as solved by Leibniz

क्रिस्चियन को यह हल बहुत पसंद आया ! लेइब्निज़ ने आगे जाकर कैलकुलस की खोज की !

आर्य प्रशांत जी को लगता है Huygens = Final Science!
लेकिन शायद उन्हें ये नहीं बताया गया कि Huygens खुद अपनी theories को absolute नहीं मानते थे। वो हमेशा सुधार की संभावना रखते थे।

लेकिन आर्य जी का 17वीं सदी का साइंस ज्ञान = “Final Truth”!
आर्य प्रशांत गजब के अद्वैत वादी हैं | उन्होंने विज्ञान और अंधविश्वास का अंतर ही मिटा दिया है !

⚛️ भाग 2: Quantum Mechanics आया… और आर्य जी वहीं रुक गए!

Quantum Mechanics ने तो पूरी classical physics को हिला कर रख दिया!

क्या आप जानते हैं कि:

  • Observer effect कहता है कि observer की उपस्थिति result बदल सकती है
  • Copenhagen, Many Worlds, Bohmian जैसे multiple interpretations हैं
  • अभी तक कोई “final” interpretation नहीं है — यानि science itself is under debate!

तो आर्य जी का ये कहना कि

“Science = verifiable and falsifiable, और सबके लिए same result”

Quantum Mechanics ने तो पूरी classical physics को हिला कर रख दिया!

क्या आप जानते हैं कि:

  • Observer effect कहता है कि observer की उपस्थिति result बदल सकती है
  • Copenhagen, Many Worlds, Bohmian जैसे multiple interpretations हैं
  • अभी तक कोई “final” interpretation नहीं है — यानि science itself is under debate!

University of Colorado के प्रसिद्ध प्रोफेसर Jeff Kasser की Philosophy of Science पर एक व्याख्यान शृंखला आती है | उसमें उन्होंने विस्तार से बताया है कि एक आवश्यक शर्त नहीं है किसी भी सिद्धांत के वैज्ञानिक होने के लिए | यह कार्ल पोप्पर का सिद्धांत था जो बहुत पहले खंडित हो चुका है !

यह व्याख्यान शृंखला और pdf archive.org पर निःशुल्क उपलब्ध है !

तो आर्य जी का ये कहना कि

“Science = verifiable and falsifiable, और सबके लिए same result”

बस 17वीं सदी का हीरो बनने की कोशिश है —
21वीं सदी की scientific humility से इनका कोई लेना-देना नहीं।

🧠 भाग 3: Thomas Hobbes, Materialism & Arya-Advaita

अब आते हैं आर्यजी के दर्शन के दूसरे स्तंभ पर —
Materialism, यानी “सिर्फ matter ही असली है, आत्मा व आत्मबोध सब बकवास है”।

ये विचारधारा दी थी — Thomas Hobbes (1588–1679)
हाँ! वही Hobbes जिन्होंने कहा कि consciousness भी neurons और atoms की game है।
और आर्य प्रशांत आज उसी को दोहरा रहे हैं — 400 साल बाद —
बस शांति और Advaita के लेप में लपेट कर!

📜 Quantum Research का आत्मा को इंगित करता शोध पत्र

अब आईये ज़रा असली विज्ञान की बात करें —
वो विज्ञान जिसे पढ़ने की शायद आर्य प्रशांत के पास डिग्री भी नहीं है।

🔬 Research Paper: “Does Quantum Mechanics Predict the Existence of Soul?”

  • लेखक: Dr. R.C. Bhowmik
  • Institution: Haldia Institute of Technology
  • Core Thesis: Quantum Mechanics और Consciousness के संबंधों में ऐसे patterns हैं जो आत्मा के अस्तित्व को संकेत देते हैं।

आप पूरा रिसर्च पेपर फ्री में यहाँ पढ़ सकते हैं:

📚 Materialism is under fire in real science!

  • Dr. Charles Tart ने पूरी किताब लिखी: “The End of Materialism”
  • Dr. Henry Stapp — दुनिया के सबसे बड़े quantum neurophilosophers ने अपने पेपर:
    📄 Quantum Physics in Neuroscience and Psychology
    में conclusively कहा: “Materialism fails to explain mind and consciousness.”
  • फिर किसी ने उन्हें refute करने की कोशिश की
    📄 Mind Efforts, Quantum Zeno Effect…
  • और Stapp ने फिर उन्हें scientific तरीके से धो डाला
    📄 Reply to Critic

यानी ये विषय विवादित है, evolving है, और बेहद complex है।

लेकिन आर्य जी इन सबके ऊपर बैठे हैं —
बिना किसी neuroscience की डिग्री, बिना psychology की समझ,
बस आत्मविश्वास और ढोंग का इंजेक्शन लिए।Dr. Charles Tart ने पूरी किताब लिखी: “The End of Materialism”

Dr. Henry Stapp — दुनिया के सबसे बड़े quantum neurophilosophers ने अपने पेपर:
📄 Quantum Physics in Neuroscience and Psychology
में conclusively कहा: “Materialism fails to explain mind and consciousness.”

फिर किसी ने उन्हें refute करने की कोशिश की
📄 Mind Efforts, Quantum Zeno Effect…

और Stapp ने फिर उन्हें scientific तरीके से धो डाला
📄 Reply to Critic

यानी ये विषय विवादित है, evolving है, और बेहद complex है।

लेकिन आर्य जी इन सबके ऊपर बैठे हैं —
बिना किसी neuroscience की डिग्री, बिना psychology की समझ,
बस आत्मविश्वास और ढोंग का इंजेक्शन लिए।

🧨 अब बोलो BITS Goa और Dubai:

“क्या यही है 21वीं सदी की आवाज़, जिसे आप मंच और माइक्रोफ़ोन दे रहे हो?”

🔚 निष्कर्ष: बौद्धिक दिवालियापन का अंतरराष्ट्रीय उत्सव!

एक तरफ पूरी दुनिया में क्वांटम मैकेनिक्स, कॉग्निटिव न्यूरोसाइंस, और कन्शसनेस स्टडीज़ जैसे अत्याधुनिक विषयों पर शोध हो रहा है; वहीं दूसरी ओर आर्य प्रशांत जैसे व्यक्ति, जिनके पास न तो न्यूरोसाइंस की डिग्री है, न ही मनोविज्ञान में शोध-पत्र प्रकाशित हैं, वे खुद को “Acharya” घोषित करके मंचों पर चढ़ते हैं और आत्मा, चेतना, और धर्म के गूढ़ विषयों पर final truth बाँटते हैं — वो भी Newton और Hobbes की सदियों पुरानी, खंडित और सीमित वैज्ञानिक सोच के आधार पर।

बड़ी विडंबना ये है कि BITS Goa, जिसे देश के श्रेष्ठतम छात्रों का गढ़ माना जाता है, वो ऐसे pseudo-intellectual को आमंत्रित करता है, जो न सिर्फ आत्मा और अध्यात्म को कहानी बताता है, बल्कि विज्ञान के नाम पर एक आउटडेटेड और हानिकारक विचारधारा को rationality का चोला पहना देता है। यह सिर्फ बौद्धिक लापरवाही नहीं है, यह युवा मनों के प्रति अपराध है।

और बात करें दुबई जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच की, तो वहाँ आर्य प्रशांत को “ज्ञानवाचस्पति” की तरह मंच देकर यह जताया गया कि science और spirituality पर बातचीत करने के लिए बस कॉन्फिडेंस और कैमरा काफी है, credentials और credibility की कोई ज़रूरत नहीं। क्या यही है वैश्विक स्तर पर thought leadership का नया मापदंड? क्या यही है ज्ञान का commercialization, जहाँ “बिकने वाला बोलने वाला” ही सत्य का वाहक बन बैठा है?

आर्य प्रशांत के भाषणों में ना ज्ञान है, ना विनम्रता, ना ही शोध की ईमानदारी। सिर्फ एक तेज़ आवाज़, एक सतही समझ, और एक ऐसा आत्मविश्वास जो तथ्यों से ज्यादा, तर्कहीनता पर आधारित है।

और अगर आप सवाल पूछ दें, तो उनके लोकधर्मी अनुयायी आपको “अंधविश्वासी”, “अज्ञानी”, “धार्मिक कट्टरपंथी” घोषित कर देंगे — जबकि वे स्वयं 17वीं सदी के विज्ञान में जमे हुए हैं, और उसे ही rationality का नवीनतम संस्करण समझते हैं।

अब सवाल यह नहीं है कि आर्य प्रशांत क्या कह रहे हैं —
सवाल यह है कि BITS Goa और Dubai जैसे मंच उन्हें क्यों बोलने दे रहे हैं?

आपसे बस एक सीधा-सा सवाल है — क्या आपने कभी इन स्वघोषित आचार्य (“Self-Proclaimed Acharya”) से उनकी कोई डिग्री माँगी? कोई प्रमाणपत्र? कोई रिसर्च पेपर? क्या यही है आपके संस्थान की नीतियाँ? क्या BITS Goa जैसे प्रतिष्ठित संस्थान अब गूढ़ वैज्ञानिक और दार्शनिक विषयों पर बातचीत के लिए बस आत्मविश्वास और सूट पहनना ही पर्याप्त मानते हैं? आप आत्मा, मन, चेतना, न्यूरोसाइंस और मनोविज्ञान जैसे गहन विषयों पर किसी ऐसे व्यक्ति को बोलने दे रहे हैं, जिसे इन विषयों में कोई औपचारिक शिक्षा नहीं, कोई रिसर्च नहीं, कोई प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशित पेपर नहीं। तो क्या अब यह माना जाए कि आपके देश और संस्थान की नीतियों में योग्यता से ज्यादा महत्व “फॉलोअर्स की संख्या” और “ऑनलाइन पॉपुलैरिटी” को मिलने लगा है? दुबई जैसे ग्लोबल प्लेटफ़ॉर्म को भी पूछना चाहिए — क्या आपके मंच पर बोलने का मापदंड भी अब ज्ञान नहीं, बल्कि लोकप्रियता और दिखावे का हो चुका है?

📌 ये केवल आर्य प्रशांत की कहानी नहीं है — ये उस पूरी मानसिकता की पोल खोलती है जो बिना गहराई, बिना प्रमाण और बिना उत्तरदायित्व के खुद को ‘बुद्धिजीवी’ कहलवाना चाहती है।