गाली गुरु दुबई में? आर्य प्रशांत के अधकचरे गाली विज्ञान का दुष्प्रभाव

सलीका सादगी सब आज़मा के यह समझ आया,
बहुत नुकसान होता है अदब से पेश आने पर।

दुनिया तरक्की कर रही है—दुबई में गगनचुंबी इमारतें बन रही हैं, लोग AI और न्यूरोसाइंस में रिसर्च कर रहे हैं, और उधर दुबई का सलीका, सादगी और सभ्यता से मन उठ गया है जो एक स्वघोषित आचार्य को बुला रहे हैं जो वास्तव में हैं —गाली गुरु! जी हाँ, भारत में जिस व्यक्ति ने अपने प्रवचनों को कॉमेडी शो बना दिया है, अब वो दुबई जा रहे हैं “अंतरराष्ट्रीय गालियों की ब्रांडिंग” करने!

लेकिन यह लेख सिर्फ भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं है। यहाँ हम बताएँगे कि कैसे यह ‘स्वघोषित आचार्य’ (जो कि विज्ञान और शोध से उतना ही दूर हैं जितना गुरुत्वाकर्षण से बबलगम) समाज में जहरीले विचार और भाषा का प्रसार कर रहे हैं। और हर एक तथ्य के साथ आपके लिए है शोधपत्र (Research Paper) और प्रमाण, ताकि आप खुद तय करें—वो आचार्य हैं या ‘गपोड़ी लाल’ ?

इस विषय में हमारा यह वीडियो द्रष्टव्य है –

0. गाली गुरु के विचार

सबसे तो पहले हम यह बता दें की ये स्वघोषित आचार्य क्या सीखा रहे हैं | “दिखावे पर ही जिओगे भाई? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)” – इस वीडियो में वो साफ़ शब्दों में गाली देने के लिए लोगों को ब्रेनवाश कर रहे हैं |

इतना ही नहीं , “धर्म का विकृत व प्रचलित रूप है “लोकधर्म” || आचार्य प्रशांत, गीता दीपोत्सव (2024)” – इस वीडियो में वह गाली देकर भी दिखा रहे हैं कि लोग क्या बोलेंगे ? हालाँकि यह उनका अपना मत नहीं है और वह स्वयं गालीबाज नहीं है | वह तो मधुशाला की तरह हैं –

स्वयं नहीं पीता, औरों को,
किन्तु पिला देता हाला,
स्वयं नहीं छूता, औरों को,
पर पकड़ा देता प्याला,
पर उपदेश कुशल बहुतेरों
से मैंने यह सीखा है,
स्वयं नहीं जाता, औरों को
पहुंचा देता मधुशाला।

उनके सान्निध्य में संस्थानों के विद्यार्थी भी गाली देने लग जाते हैं जिसे “अंधविश्वास सफल कैसे हो जाता है – तीन कारण (तीसरा खतरनाक है) || आचार्य प्रशांत (2023)” – इस वीडियो में देखा जा सकता है !

1. Cambridge University: Communicating for Influence & Impact

प्रशिक्षण: University of Cambridge Executive Education
कोर्स: Communicating for Influence and Impact
क्या सिखाया गया:

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के Communicating for Influence and Impact कोर्स से मैंने यह सीखा कि मतभेद होने पर भी अपनी बात को शांति, सलीके और पेशेवर अंदाज़ में रखा जा सकता है। हमें सिखाया गया कि यदि किसी विषय पर असहमति हो, तो सीधे “आप गलत हैं” कहने की बजाय, हम सम्मानपूर्वक कह सकते हैं — “इस पर मेरा एक अलग दृष्टिकोण है।” इसी तरह, यदि कोई बार-बार बीच में बोल रहा हो, तो गुस्से या कटुता से प्रतिक्रिया देने की बजाय हम कह सकते हैं — “मैं दस सेकंड में अपनी बात समाप्त करता हूँ, फिर मंच आपके लिए है।” यह तरीका संवाद को न केवल प्रभावशाली बनाता है, बल्कि संबंधों में गरिमा भी बनाए रखता है।

किसी भी वैश्विक संस्थान में यही सिखाया जाता है –

  • उच्चस्तरीय नेतृत्व में भाषा का संयम क्यों ज़रूरी है
  • कैसे शब्दों से समाज में healing और transformation लाई जा सकती है

ये हैरानी की बात है कि जहां कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रभावी संवाद सिखाता है वहाँ ये गाली गुरु ने वाला कोर्स निकाल दिया ! कैंब्रिज यूनिवर्सिटी का कोर्स लीडर्स को प्रशिक्षित करता है जबकि इनका कोर्स इनके बेरोजगार अंधभक्तों को गालीबाज बनाता है !

2. Psychology Research: Dark Side of Charismatic Leadership

क्या प्रभावशाली नेता समाज को बर्बादी की ओर ले जा सकते हैं?

🧾 लेखक परिचय:

यह रिसर्च पेपर लिखा गया है Xue Zhang, Liang Liang, Guyang Tian, और Yezhuang Tian द्वारा, जो Harbin Institute of Technology (School of Management), China से जुड़े हुए हैं। यह संस्थान चीन के प्रमुख तकनीकी और प्रबंधन संस्थानों में से एक है।
इनमें से:

Xue Zhang और Liang Liang मैनेजमेंट स्कूल के शोध छात्र हैं।

Guyang Tian और Yezhuang Tian इस शोध के प्रमुख संपर्ककर्ता और सीनियर फैकल्टी सदस्य हैं, जिनके पास ऑर्गनाइज़ेशनल बिहेवियर और साइकोलॉजी में गहरा अनुभव है।

🔍 पेपर का सार:

इस पेपर में बताया गया है कि कैसे चारिस्मैटिक लीडरशिप (आकर्षक नेतृत्व)—जिसे आमतौर पर सकारात्मक और प्रेरणादायक माना जाता है—वास्तव में एक अंधेरे पक्ष को भी जन्म दे सकता है। लेखक बताते हैं कि जब कोई लीडर अत्यधिक करिश्माई होता है, तो वह अपने अनुयायियों को ऐसा मनोवैज्ञानिक सुरक्षा भाव (Psychological Safety) देता है जिससे वे जोखिम लेने को तैयार हो जाते हैं—भले ही यह अनैतिक क्यों न हो!

🧪 प्रयोग और निष्कर्ष:

214 कर्मचारियों पर अध्ययन किया गया, जो एक सर्विस इंडस्ट्री में कार्यरत थे।

शोधकर्ताओं ने पाया कि Charismatic Leaders, अपने फॉलोअर्स को इतना सुरक्षित महसूस कराते हैं कि वे सोचते हैं—अगर हम कुछ “गलत” भी करें, तो भी हमारी मंशा कंपनी के हित में है और हमें सजा नहीं मिलेगी।

यह “मनोवैज्ञानिक सुरक्षा” तब और भी खतरनाक बन जाती है जब कंपनी में performance pressure बहुत अधिक होता है।

ऐसे में फॉलोअर्स unethical behavior को सही मानने लगते हैं—जैसे, झूठ बोलना, क्लाइंट को गुमराह करना, या सच्चाई छुपाना—क्योंकि उन्हें लगता है कि वे कंपनी के लिए कुछ अच्छा कर रहे हैं।

🧩 सैद्धांतिक मॉडल:

यह रिसर्च एक थ्योरी पर आधारित है जिसे कहते हैं Social Information Processing Theory। इसका सार यह है कि व्यक्ति अपने आस-पास के सामाजिक संकेतों से यह तय करता है कि क्या सही है और क्या गलत। जब करिश्माई लीडर बार-बार कहता है—”तुम बहुत काबिल हो”, “तुम कुछ भी कर सकते हो”—तो अनुयायी को लगता है कि वो कुछ भी कर सकता है, चाहे वो नैतिक रूप से ठीक हो या नहीं।

💥 निष्कर्ष:

यदि इस पेपर को भारतीय संदर्भ में समझें, तो यह साफ करता है कि कोई भी प्रवचनकर्ता, चाहे कितना भी बुद्धिमान दिखे, अगर उसका तरीका एक cult की तरह blind loyalty और performance pressure पर आधारित है, तो उसके अनुयायी ethical lines को पार कर सकते हैं—बिना ये सोचे कि वे असल में गलत कर रहे हैं।

3. Psychology Today: Verbal Abuse Can Damage the Brain

प्रकाशन: Psychology Today

यह लेख डॉ. जेनिफर फ्रेजर (Jennifer Fraser, Ph.D.) द्वारा लिखा गया है, जो एक जानी-मानी शिक्षाविद्, लेखक, और The Bullied Brain नामक पुस्तक की लेखिका हैं। उन्होंने Verbal Abuse यानी “शब्दों के माध्यम से की गई हिंसा” पर गहन रिसर्च प्रस्तुत की है और बताया है कि यह केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि मस्तिष्क पर स्थायी शारीरिक प्रभाव छोड़ती है। उन्होंने न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. मार्टिन टीशर (Dr. Martin Teicher) के अध्ययन का हवाला दिया, जिसमें दिखाया गया कि गाली-गलौज, चिल्लाना, उपहास करना, बार-बार टोकना, और आलोचना जैसे व्यवहारों से मस्तिष्क के “कॉर्पस कैलोस्म” (corpus callosum) हिस्से में मायलिन की परत घिसने लगती है। मायलिन वह परत होती है जो दिमाग के दोनों हिस्सों के बीच तेज़ और कुशल संचार में मदद करती है। जब यह परत कमजोर होती है, तो सोचने, समझने और भावनात्मक नियंत्रण की क्षमता पर बुरा असर पड़ता है।

डॉ. फ्रेजर कहती हैं कि यह गंभीर तथ्य है कि शारीरिक और यौन हिंसा की तरह ही शब्दों की हिंसा (verbal abuse) भी मस्तिष्क पर बराबर असर डालती है, लेकिन यह अब तक हमारी नीतियों, कानूनों और समाज की चेतना में वह स्थान नहीं पा सकी है। fMRI स्कैन यह दिखा चुके हैं कि जिन बच्चों को केवल भावनात्मक या भाषाई हिंसा मिली हो, उनके दिमाग में भी वैसे ही जख्म होते हैं जैसे युद्ध के मैदान से लौटे सैनिकों में PTSD के दौरान पाए जाते हैं। इसीलिए, अगर शरीर को नुकसान पहुँचाना अपराध है, तो दिमाग को नुकसान पहुँचाना भी अपराध होना चाहिए। 2023 में भी हम अपने स्कूलों, दफ्तरों, खेल और कला क्षेत्रों में भवन सुरक्षा, आग से सुरक्षा तो करते हैं, लेकिन मानसिक सुरक्षा की ओर ज़िम्मेदारी से नहीं बढ़ते। यह लेख एक चेतावनी है कि हमें शब्दों के उपयोग को लेकर उतना ही संवेदनशील और जिम्मेदार होना चाहिए जितना किसी तेज़ हथियार के इस्तेमाल को लेकर होते हैं — क्योंकि शब्द भी घाव देते हैं, और वे घाव दिखते नहीं, पर दिमाग को चीर देते हैं।

इस लेख को आप यहाँ से पढ़ सकते हैं !

4. Statistics in Psychology: Scientific Process Before Conclusions

मनोवैज्ञानिक अध्ययन के चरण: कैसे होता है वैज्ञानिक निष्कर्ष?

दुनियाँ के हर विश्व स्तरीय मनोवैज्ञानिक कोर्स में स्टैटिस्टिकल मेथड्स पढ़ाये जाते हैं कि मनोवैज्ञानिक प्रश्नों को वैज्ञानिक तरीके से कैसे हल करते हैं | इस तरह की कई पुस्तकें बाजार में उपलब्ध हैं –

I. Problem Identification (समस्या की पहचान)

🔍 क्या गाली-गलौज (verbal abuse) किसी व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य या सामाजिक व्यवहार पर नकारात्मक प्रभाव डालती है?

यह सबसे पहला चरण होता है — एक स्पष्ट, मापने योग्य प्रश्न तय करना।

II. Formulation of Hypothesis (परिकल्पना तैयार करना)

Null Hypothesis (H₀): गाली-गलौज का किसी के मानसिक स्वास्थ्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
Alternative Hypothesis (H₁): गाली-गलौज का मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

यह परिकल्पना इस आधार पर बनती है कि इसे आँकड़ों के ज़रिए जाँचा जा सके।

III. Designing the Study (अध्ययन की रचना करना)

Population: युवा वर्ग, कार्यस्थल पर काम करने वाले लोग, या छात्र

Sample Size: मान लीजिए 300 प्रतिभागी

Groups:

  • Group A: सामान्य संवाद में रहने वाले
  • Group B: नियमित रूप से verbal abuse का सामना करने वाले

Variables:

  • Independent Variable: गाली-गलौज का स्तर
  • Dependent Variable: स्ट्रेस स्कोर, डिप्रेशन स्केल, ब्रेन इमेजिंग आदि

IV. Data Collection (डेटा संग्रह करना)

  • Instruments:
    • Beck Depression Inventory (BDI)
    • General Anxiety Disorder Scale (GAD-7)
    • fMRI या EEG (brain scan के लिए)
  • Method:
    • Questionnaires
    • Interviews
    • Neurological tests
    • Observational data

V. Data Analysis (डेटा विश्लेषण करना)

Statistical Tools:

  • T-test, ANOVA, Correlation Analysis, Regression Analysis

इन टूल्स की मदद से Group A और Group B के बीच के मानसिक स्वास्थ्य स्कोर का अंतर जाँचा जाएगा।

VI. Interpretation of Results (परिणामों की व्याख्या करना)

अगर Group B में anxiety, stress, या brain damage के संकेत Group A की तुलना में ज़्यादा पाए जाएँ, तो H₀ को reject कर दिया जाएगा — जिससे यह सिद्ध होगा कि verbal abuse का मानसिक स्वास्थ्य पर असर होता है।

VII. Drawing Conclusions & Publishing in Journals (निष्कर्ष और जर्नल में प्रकाशित करना)

इसके बाद इस पूरे प्रक्रिया से गुजर कर ही परिणाम और निष्कर्ष निकाले जाते हैं | फिर इसे किसी जर्नल में प्रकाशित कराया जाएगा !

लेकिन स्वघोषित आचार्य के पास न साइकोलॉजी या न्यूरोसाइंस में कोई डिग्री है न ही इनका कोई शोध किसी वैज्ञानिक जर्नल में प्रकाशित हुआ है | लेकिन बस इन्हे बड़बोलेपन की बीमारी है ! जिस विषय में इनके पास कोई ज्ञान नहीं उस विषय में लम्बे लम्बे हांकना इनका पसंदीदा टाइमपास है ! ये एक उच्च कोटि के अद्वैतवादी हैं जिन्होंने न सिर्फ मोह माया का अतिक्रमण कर लिया है बल्कि साइंटिफिक मेथड्स का भी अतिक्रमण कर लिया है | उन्हें न डाटा चाहिए न शोध, सीधे निष्कर्ष बता देते हैं !

5. Social Contagion of Aggression in Groups

कैसे एक गाली पूरी भीड़ को संक्रमित कर देती है?

शोधपत्र: Social Contagion of Aggressive Language in Groups
लेखक: S. Paluck, Princeton University
मुख्य बिंदु:

  • जब कोई प्रभावशाली व्यक्ति गाली जैसी भाषा को वैधता देता है, तो वो भीड़ में तेजी से फैलती है
  • यह language culture को बदल देती है और नई पीढ़ी को हिंसा की ओर ले जाती है

इस शोध को आप यहाँ देख सकते हैं |

इसीलिए आप पाएंगे कि इन स्वघोषित आचार्य के अंधभक्तों को भी गालीबाजी करता हुआ पाएंगे ! यह प्रभाव इन वैज्ञानिक शोधों के अनुरूप है !

6. डिग्री और प्रमाण का महत्त्व

किसके पास है विश्वासयोग्य ज्ञान का अधिकार?

  • हमने peer-reviewed research papers दिए
  • हमने Cambridge certificate दिखाया

और उधर? IIT-IIM की ढाल के पीछे छुपकर ज्ञान का मज़ाक उड़ाया जा रहा है!

निष्कर्ष नहीं, बस सवाल…

वाह रे दुबई! ऊँची-ऊँची इमारतें बना लीं, रेगिस्तान में फूल खिला दिए, लेकिन गुरु चुनने की समझ अब भी बालपन में ही अटकी हुई है। जिस देश में दुनिया भर की टेक्नोलॉजी और समृद्धि की नुमाइश होती है, वही देश अब ऐसे “गाली गुरु” को बुला रहा है जो लोगों को सभ्यता नहीं, सलीके से गुस्सा करना सिखा रहा है! लगता है दुबई अब सिर्फ़ economic hub नहीं, verbal aggression का export-import center भी बनना चाहता है। क्या यह वही दुबई है जो शांति, विकास और भविष्य की बात करता था — या अब हर मंच पर गालियोंको भी आध्यात्मिक बना देना चाहता है? दुबई को अब सोचने की ज़रूरत है: गगनचुंबी इमारतों से ज़्यादा ज़रूरी है ज़मीन पर खड़ी नैतिकता।

अब वक्त आ गया है कि दुबई जैसे विकसित और आधुनिक सोच रखने वाले देश, और साथ ही आम जनता भी, इन वैज्ञानिक शोधों को हल्के में न लें। यह कोई भावना या व्यक्तिगत पसंद-नापसंद की बात नहीं है — यह शोध कह रहा है कि गाली-गलौज और अपमानजनक भाषा मस्तिष्क को उसी तरह नुकसान पहुंचाती है जैसे शारीरिक या यौन शोषण करता है। सोचिए, अगर कोई व्यक्ति मंच से मुस्कराते हुए ऐसे व्यवहारों को सहज बना रहा है, और उसका प्रभाव युवाओं और श्रोताओं के व्यवहार में दिखने लगा है, तो क्या ये सिर्फ़ ‘बोलने की आज़ादी’ है? या एक सुनियोजित मनोवैज्ञानिक विषाक्तता (Psychological Toxicity) है? दुबई को यह तय करना होगा कि वह आधुनिकता के नाम पर अभद्रता को बढ़ावा देगा या एक सभ्य, सम्मानजनक सामाजिक वातावरण का पक्षधर बनेगा। और आम जनमानस को भी सोचना होगा — क्या आप उस व्यक्ति को सुनते रहेंगे जो बिना किसी वैज्ञानिक प्रशिक्षण के, शब्दों के ज़हर को “ज्ञान” बनाकर बेच रहा है? निर्णय आपका है… लेकिन परिणाम सबको भुगतना पड़ेगा।

हमने कोई गाली नहीं दी, कोई नाम नहीं रखा, कोई अपशब्द नहीं कहे।
हमने बस सवाल उठाए—और प्रमाण दिए।
अब तय आपको करना है—गाली गुरु को दुबई बुलाना “लोकधर्म” है या “लोक-विनाश”?