क्या हिंदू धर्म अनैतिक है? बौद्ध ग्रंथों में क्या लिखा है?

भूमिका: विवाद की पृष्ठभूमि

हाल ही में रणवीर अल्लाहबादिया के विवादित बयान को लेकर एक नव-बौद्ध (Neo-Buddhist) यूट्यूबर ने हिंदू धर्म पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि हिंदू धर्म की शिक्षाएँ ही इस तरह की सोच को बढ़ावा देती हैं। अपने तर्क को प्रमाणित करने के लिए उन्होंने महाभारत में ऋषि पराशर और सत्यवती की कथा तथा ऋग्वेद 10/86/16-17 को उद्धृत किया और कहा कि यह ग्रंथ “अनैतिकता” को बढ़ावा देते हैं। उनका कहना है कि वेद व्यास ने स्वयं अपने माता पिता के सहवास की बात की है तो फिर रणवीर ने कर दी तो क्या बुरा हो गया?

लेकिन क्या यह निष्कर्ष तथ्यात्मक और निष्पक्ष है, या यह एक सोची-समझी चुनिंदा व्याख्या है?

यह चौंकाने वाला और दुखद है कि एक संपूर्ण धर्म, जिसकी जड़ें हजारों वर्षों के ज्ञान और अध्यात्म में निहित हैं, उसे केवल चुनिंदा और संदर्भहीन उद्धरणों के आधार पर कलंकित करने का प्रयास किया जा रहा है। सनातन धर्म, जिसने बुद्ध को जन्म दिया, जिसने करुणा और अहिंसा को अपनाया, उसी पर आज अन्यायपूर्ण आरोप लगाए जा रहे हैं। क्या हम सचमुच ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ शास्त्रों को बिना गहराई से समझे दोषी ठहराया जाता है? क्या हमें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करना ही सत्य की खोज बन गई है? इस वीडियो में हमने इन सभी प्रश्नों के उत्तर प्रमाण सहित दिए हैं-

इस लेख में हम इस दावे की तटस्थ और प्रमाणित समीक्षा करेंगे और साथ ही यह भी देखेंगे कि क्या बौद्ध ग्रंथों में भी ऐसी कथाएँ मौजूद हैं। साथ ही हम आपके साथ उन सभी प्रमाणों के PDF ग्रन्थ भी साझा करेंगे |

आइए, इस चर्चा को प्रेम और तर्क के साथ आगे बढ़ाएँ।

खंड 1: जातक कथाएँ और बौद्ध परंपरा में ऐसे ही प्रसंग

हिंदू धर्म को दोष देने से पहले हमें यह देखना होगा कि क्या बौद्ध ग्रंथों में भी इसी प्रकार की कथाएँ मिलती हैं। यदि हाँ, तो क्या हमें इन्हें भी “अनैतिक” कहकर खारिज करना चाहिए?

1. राध जातक (Raadh Jataka – जातक #145)

भदन्त आनंद कौशल्यायन की टीका की हुई जातक कथाएं छह खण्डों में आती है | उसके दूसरे खंड (पृष्ठ 140) में यह जातक हमें प्राप्त होता है | इसे आप यहाँ से डाऊनलोड कर सकते हैं –

👉 कथा सार:

  • इसमें भगवान् बुद्ध ने अपने पिछले जन्म में, जब वह पोट्ठपाद नमक तोता थे, अपने व्यभिचारिणी पालक माँ की करनी स्वयं अपने पालक पिता को सुनाई है !
  • यह कथा धर्म और एकांत के प्रलोभन के द्वंद्व को दर्शाती है, न कि किसी “अनैतिकता” को बढ़ावा देती है।

🔹 सवाल: अगर महाभारत में पराशर-सत्यवती की कथा को “अनैतिक” कहा जाता है, तो क्या इस जातक कथा को भी “अनैतिक” घोषित किया जाएगा?

निष्कर्ष: यह दिखाता है कि बौद्ध धर्म में भी ऐसी कथाएँ हैं जिनमें अनैतिक संबंधों का उल्लेख है। लेकिन यह अनैतिकता नहीं, बल्कि धार्मिक और दार्शनिक शिक्षाओं के प्रतीक हैं

2. अलम्बुस जातक (Alambus Jataka – जातक #523)

भदन्त आनंद कौशल्यायन की टीका की हुई जातक कथाएं छह खण्डों में आती है | उसके पंचम खंड (पृष्ठ 232) में यह जातक हमें प्राप्त होता है | इसे आप यहाँ से डाऊनलोड कर सकते हैं –

👉 कथा सार:

  • इस कथा में इंद्रदेव को भय होता है कि एक महर्षि की तपस्या इतनी प्रबल है कि वह स्वर्ग पर प्रभाव डाल सकती है
  • इंद्रदेव अप्सरा अलम्बुसा को भेजते हैं ताकि वह उस तपस्वी को मोहित कर सके
  • अंततः ऋषि अपनी तपस्या से विचलित हो जाते हैं
  • वहाँ पर ऋषि के उदगार भी सामान्य दृष्टि से अश्लील लग सकते हैं लेकिन वह उद्दीपन रस है , जो कोई साहित्य प्रेमी ही समझ सकता है |


🔹 सवाल:

  • जब बौद्ध ग्रंथों में इंद्र खुद अप्सराओं को भेजते हैं ताकि तपस्वियों को विचलित किया जाए और ऋषि के तथाकथित अश्लील शब्द भी हैं, तो क्या यह अनैतिकता का प्रमाण है?
  • क्या हमें फिर यह कहना चाहिए कि बौद्ध धर्म “अनैतिकता” को बढ़ावा देता है? नहीं, बिलकुल नहीं ! साहित्य में इसे उद्दीपन रस कहते हैं |

निष्कर्ष:

  • यह कथा भी बौद्ध परंपरा में वर्णित है। यदि इसे बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का हिस्सा माना जाता है, तो महाभारत की कथा पर दोहरे मापदंड क्यों अपनाए जाएँ?
  • इन कहानियों को का सार बस इतना है कि जीवन में कई बातें अपने हिसाब से नहीं, दैव के हिसाब से होती है | इसके अतिरिक्त चमत्कारपूर्ण घटनाओं से बतायी गयी कहानियाँ दिल पर असर करती हैं, अधिक समय तक लोगों के स्मृतियों में रहती हैं और लोगों में उत्सुकता पैदा करती हैं |
  • इसके अतिरिक्त यहाँ मन की चंचलता और ध्यान और साधना की महत्ता भी प्रदर्शित की गयी है | भगवान् बुद्ध स्वयं धम्मपद के पहले अध्याय यमक वग्गो में कहते हैं –

यथा अगारं दुच्छन्नं, वुट्टी समतिविज्झति ।

एवं अभावितं चित्तं, रागो समतिविज्झति ।।

जैसे यदि घर की छत ठीक न हो तो
उसमें वर्षा का पानी घुस जाता है,
उसी प्रकार असंयमित मन में राग घुस जाता है।

धम्मपद यमक वग्गो #13

धम्मपद पर विपस्सना शोध संस्थान की हिंदी टीका यहाँ से डाऊनलोड करें –

खंड 2: ऋग्वेद 10/86/16-17 की सही व्याख्या

👉 आरोप:

  • नव-बौद्ध यूट्यूबर ने ऋग्वेद 10/86/16-17 को उद्धृत करके दावा किया कि यह “विषयवादी” भाषा का प्रयोग करता है। उनका कहना है की ग्रिफ्फिथ महोदय ने दो मन्त्रों का अनुवादअश्लील समझ कर नहीं किया | आलोचक ने गंगा प्रसाद सहाय की टीका भी उद्धृत की है |

👉 उत्तर:

  • इस मंत्र की प्रामाणिक व्याख्या प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान हरिशरण सिद्धांतलंकार ने की है।
  • उनका अनुवाद संस्कृत व्याकरण और वैदिक परंपरा के अनुरूप है और यह दर्शाता है कि इन मंत्रों का अर्थ प्रतीकात्मक है, न कि सतही। यहाँ ज्ञान और ध्यान से प्राप्त आनंद का वर्णन है और वासना का लेश मात्र भी नहीं है |

🔹 सही अनुवाद (हरीशंकर सिद्धांतलंकार द्वारा):

Rigved 10/86-16 translated by Harisharan Siddhantalankar
Rigved 10/86-17 translated by Harisharan Siddhantalankar
  • वैदिक साहित्य में कई जगह रूपकों (metaphors) और प्रतीकात्मक भाषा का प्रयोग होता है।

हरिशरण सिद्धान्तालंकार का अनुवाद आप यहाँ से डाऊनलोड कर सकते हैं-

निष्कर्ष:

  • यह संदर्भ से काटकर दी गई व्याख्या है। केवल एक टीका से अनुवाद पढ़कर कोई वेद का पारगामी विद्वान् नहीं हो सकता | हमें कई टीकाओं का अध्ययन करके यह देखना होता है की कौन सा अर्थ हिन्दू धर्म के अनुकूल बैठता है | सैंधव का अर्थ घोडा भी होता है और नमक भी | लेकिन कोई बावला व्यक्ति ही होगा जो खाते समय सैंधव मांगने वाले व्यक्ति को घोडा ला के थमा दे !
  • यदि हम संस्कृत के विशेषज्ञों का अनुवाद देखें, तो स्पष्ट होगा कि इसका मूल अर्थ आधुनिक आलोचकों द्वारा लगाए गए आरोपों से बिल्कुल भिन्न है
  • इसके अतिरिक्त आलोचक गीता में आये इन श्लोकों को नहीं देखते जहाँ भगवान् कृष्ण ने अनैतिक काम वासना को मनुष्य का शत्रु बताया है –

“काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।

महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥”

श्रीभगवान् बोले – रजोगुणसे उत्पन्न हुआ  यह काम ही क्रोध  है। यह बहुत खानेवाला और महापापी है। इस विषयमें तू इसको ही वैरी जान।

श्रीमद् भगवद्गीता 3/37

और भी देखिये | भगवान् यहाँ धर्म सम्मत काम की ही आज्ञा देते हैं –

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्। 

धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ।।

हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! बलवालोंमें काम और रागसे रहित बल मैं हूँ। मनुषयोंमें धर्मसे अविरुद्ध (धर्मयुक्त) काम मैं हूँ।

श्रीमद् भगवद्गीता 7/11

गीता की विभिन्न टीकाएं आप यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं |

निष्कर्ष: हमें सत्य को प्रेम से फैलाना है, न कि क्रोध से

🔹 सत्य के दोहरे मापदंड को उजागर करें – जब बौद्ध ग्रंथों में भी समान कथाएँ मौजूद हैं, तो फिर हिंदू धर्म पर यह विशेष आरोप क्यों?

🔹 धर्मों को तोड़ने के बजाय जोड़ने का प्रयास करें – भगवान बुद्ध स्वयं सनातन परंपरा से आए थे और उन्होंने कभी भी हिंदू धर्म को अपमानित नहीं किया।

🔹 ज्ञान के दीप जलाएँ – क्रोध से नहीं, बल्कि प्रेम और तर्क से सत्य को आगे बढ़ाएँ।

अंतिम संदेश:

न हि वेरेन वेरानि, सम्मन्तीध कुदाचनं।

अवेरेन च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो॥ – धम्मपद यमक वग्गो #5

नफरत को नफरत से नहीं, केवल प्रेम से मिटाया जा सकता है।” – भगवान बुद्ध

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